Him Beat News | शिमला
Himachal High Court ने सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों के कर्मचारियों के तबादलों और उनकी गरिमा को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी कर्मचारी को ऐसे विभाग या विंग में ट्रांसफर नहीं किया जा सकता, जहां उसका मूल पद ही स्वीकृत न हो।न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की एकल पीठ ने कहा कि ऐसा करना न सिर्फ कर्मचारी के रुतबे और गरिमा को ठेस पहुंचाता है, बल्कि यह सीधे तौर पर सेवा शर्तों का भी उल्लंघन है।
HPU की सीनियर प्राइवेट सेक्रेटरी का ट्रांसफर ऑर्डर रद्द
यह फैसला हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी (HPU) की सीनियर प्राइवेट सेक्रेटरी सुषमा वर्मा की याचिका का निपटारा करते हुए आया। अदालत ने याचिकाकर्ता के 19 फरवरी 2024 के ट्रांसफर ऑर्डर को तुरंत प्रभाव से रद्द कर दिया है। अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि यूनिवर्सिटी के कंस्ट्रक्शन डिवीजन (निर्माण विंग) में सीनियर प्राइवेट सेक्रेटरी का कोई भी पद स्वीकृत नहीं है। नियोक्ता (Employer) से यह उम्मीद की जाती है कि वह कर्मचारी को उसी स्थान पर तैनात करे, जहां उसका पद उपलब्ध हो। यदि किसी ट्रांसफर ऑर्डर से कर्मचारी का स्टेटस या गरिमा प्रभावित होती है, तो वह कानूनन अवैध है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी: “जब कोई कर्मचारी किसी विशेष पद पर कार्यरत होता है, तो उसे उसके दर्जे के मुताबिक ही काम और पोस्टिंग मिलनी चाहिए। विश्वविद्यालय प्रशासन को यह स्वतंत्रता है कि वे कर्मचारी का तबादला किसी अन्य विंग में करें, लेकिन शर्त यह है कि वहां वह पद स्वीकृत और खाली होना चाहिए।”
क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता सुषमा वर्मा विश्वविद्यालय में सीनियर प्राइवेट सेक्रेटरी के पद पर तैनात थीं। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने 19 फरवरी 2024 को एक आदेश जारी कर उनका तबादला चीफ वार्डन कार्यालय से कंस्ट्रक्शन डिवीजन में कर दिया था। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि कंस्ट्रक्शन डिवीजन में सीनियर प्राइवेट सेक्रेटरी का पद ही मौजूद नहीं था। आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता को जानबूझकर अपमानित करने के लिए ऐसी जगह भेजा गया, जहां उनसे जूनियर स्टेनोग्राफर का काम लेने का प्रयास किया जा रहा था। उन्हें एक ऐसे असिस्टेंट इंजीनियर के अधीन काम करने को मजबूर किया गया, जिनका पे-स्केल खुद याचिकाकर्ता के बराबर था।
यूनिवर्सिटी प्रशासन का पक्ष
विश्वविद्यालय प्रशासन ने अदालत में दलील दी कि किसी भी कर्मचारी का तबादला करना यूनिवर्सिटी का विशेषाधिकार (Prerogative) है। यह निर्णय पूरी तरह से प्रशासनिक अनिवार्यताओं को देखते हुए लिया गया था और कर्मचारी यह तय नहीं कर सकता कि उसकी तैनाती कहां की जाए। हालांकि, कोर्ट ने यूनिवर्सिटी की इस दलील को खारिज कर दिया।







