CPS आवास विवाद : हिमाचल हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा- किस आदेश के तहत बंगलों में रह रहे हैं पूर्व CPS

हिमाचल हाईकोर्ट ने पूर्व CPS के सरकारी आवासों पर कब्जे को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने सरकार से 6 जून के उस आदेश का रिकॉर्ड मांगा है, जिसके तहत उन्हें बंगलों में रहने की अनुमति दी गई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SC ने उनकी बर्खास्तगी पर कोई

May 8, 2026 11:16 AM

एचबी ब्यूरो, शिमला | हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने पूर्व मुख्य संसदीय सचिवों (CPS) की ओर से सरकारी आवासों पर कब्जे को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस गुरमीत सिंह संधावालिया और जस्टिस बीसी नेगी की खंडपीठ ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह 06 जून 2025 के उस विशिष्ट आदेश को रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करें, जिसके आधार पर पूर्व CPS को सरकारी आवासों में बने रहने की अनुमति दी गई है।

सरकार का पक्ष : सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार

सुनवाई के दौरान सरकार ने कोर्ट को सूचित किया कि नियुक्तियां रद्द होने के बाद भी पूर्व CPS अभी भी सरकारी आवासों का उपयोग कर रहे हैं। इनके द्वारा न तो किसी शुल्क का भुगतान किया जा रहा है और न ही विधानसभा सचिवालय इनके वेतन से कोई कटौती कर रहा है। सरकार का तर्क है कि इन्हें सरकारी आवासों में रहने की अनुमति देने का निर्णय सुप्रीम कोर्ट में लंबित विशेष अनुमति याचिका (SLP) के निपटारे पर निर्भर करेगा।

अदालत ने कहा- जजों को आवंटित किए जा सकते हैं आवास

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकार के तर्क को स्पष्ट करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने CPS की बर्खास्तगी पर कोई रोक नहीं लगाई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रोक केवल उनकी विधायकी (सदस्यता) को लेकर है, न कि उनके पद से हटाए जाने के फैसले पर। अदालत ने यह भी कहा कि जिन आवासों पर पूर्व CPS का कब्जा है, वे हाईकोर्ट के समीप स्थित हैं। इन आवासों का उपयोग उन न्यायाधीशों को आवंटित करने के लिए किया जा सकता है जिन्हें वर्तमान में लंबी दूरी तय करके कोर्ट आना पड़ता है।

यह है मामला

उल्लेखनीय है कि हाईकोर्ट ने 13 नवंबर 2024 को कांग्रेस सरकार द्वारा नियुक्त 6 CPS को पद से हटाने के ऐतिहासिक आदेश जारी किए थे। कोर्ट ने साल 2006 के CPS एक्ट को असंवैधानिक बताते हुए इसे निरस्त कर दिया था और सभी सरकारी सुविधाएं (गाड़ी, बंगला, सैलरी, स्टाफ) तुरंत प्रभाव से वापस लेने का आदेश दिया था। राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जहां नियुक्ति को तो असंवैधानिक माना गया है, लेकिन सदस्यता पर फैसला अभी विचाराधीन है।

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