Shimla : ससुर के अवैध कब्जे पर बहू की चुनावी अयोग्यता, हिमाचल हाईकोर्ट ने रोक से किया इंकार

हिमाचल हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव से जुड़े अहम मामले में ससुर के सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के आधार पर बहू की चुनावी अयोग्यता पर रोक लगाने से इंकार किया। फैसले ने पंचायतीराज चुनाव नियमों और उम्मीदवारों की पात्रता को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी संकेत दिए हैं।

May 9, 2026 12:56 PM

एचबी ब्यूरो , शिमला | हिमाचल हाईकोर्ट ने पंचायतीराज चुनाव से संबंधित एक महत्वपूर्ण मामले में राज्य सरकार के संशोधित प्रावधान पर तत्काल रोक लगाने से इंकार कर दिया है। इस नए नियम के तहत, यदि किसी महिला के सास-ससुर सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के दोषी पाए जाते हैं, तो वह महिला पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य मानी जाएगी।

हाईकोर्ट ने जनहित याचिका पर उठाए सवाल

यह मामला शुक्रवार को हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल जनहित (Public Interest) के आधार पर इस तरह की याचिका में हस्तक्षेप करना उचित नहीं है। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि किसी महिला को इस निर्णय से व्यक्तिगत तौर पर नुकसान हुआ है, तो उसे स्वयं न्याय के लिए अदालत आना चाहिए।

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महिला मंडल की याचिका और संवैधानिक अधिकार

यह याचिका एक महिला मंडल द्वारा दायर की गई थी, जिसमें हिमाचल प्रदेश पंचायतीराज अधिनियम की धारा 122 में किए गए संशोधन को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह संशोधन महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की चुनावी भागीदारी को बाधित करता है। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिका की वैधानिकता (Maintainability) पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या याचिकाकर्ता इस नियम से सीधे प्रभावित हैं? जब अदालत याचिकाकर्ता के तर्कों से संतुष्ट नहीं हुई, तो याचिकाकर्ताओं ने इसे वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे स्वीकार कर लिया गया।

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क्या है ‘परिवार’ की नई परिभाषा?

सरकार ने हाल ही में पंचायतीराज अधिनियम की धारा 122 में संशोधन कर “परिवार” के दायरे को बढ़ा दिया है:

  • पुरानी व्यवस्था: 1994 के अधिनियम के तहत परिवार में दादा-दादी, माता-पिता, पति-पत्नी और संतान शामिल थे। इसमें बहू का स्पष्ट उल्लेख नहीं था।
  • नया संशोधन: अब सास-ससुर के अतिक्रमण के दोषी होने पर बहू भी चुनाव लड़ने के लिए पात्र नहीं होगी।

नामांकन से ठीक पहले लागू हुआ नियम

याचिका में यह भी मुद्दा उठाया गया कि यह संशोधन नामांकन प्रक्रिया शुरू होने से मात्र एक दिन पहले लागू किया गया। इससे चुनाव की तैयारी कर रही कई महिलाओं के सामने अचानक कानूनी संकट खड़ा हो गया है।

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